बांकुड़ा- पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले में आज भी एक ऐसी अनोखी परंपरा जीवित है, जहाँ मुरी (फूला हुआ चावल) सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि आस्था और संस्कृति का प्रतीक है। केंजाकुड़ा क्षेत्र में द्वारकेश्वर नदी के तट पर लगने वाला सौ साल से भी अधिक पुराना मुरी मेला मकर संक्रांति के बाद माघ महीने की 4 तारीख को हजारों लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
लोककथा के अनुसार, एक बार भगवान नारायण नारद मुनि के साथ बांकुड़ा के ऊपर से गुजर रहे थे। तभी उन्हें “चड़चड़” की आवाज़ सुनाई दी। नारद मुनि ने बताया—यह आवाज़ बांकुड़ा के लोगों द्वारा मुरी में पानी डालने की है। कथा चाहे मिथक हो या सत्य, लेकिन बांकुड़ा और मुरी का रिश्ता आज भी उतना ही गहरा है।
आठ से अस्सी वर्ष तक के लोग अपने परिवार के साथ नदी की रेत में छोटे-छोटे गड्ढे खोदकर पानी इकट्ठा करते हैं और उसमें मुरी भिगोकर खाते हैं। मुरी के साथ चॉप, बेगुनी, प्याज़, घुगनी, हरी मिर्च, खीरा, नारियल और चनाचूर इस मेले की खास पहचान हैं।
इस परंपरा की शुरुआत संजीवनी माता आश्रम के हरिनाम संकीर्तन से जुड़ी मानी जाती है। पहले दूर-दराज़ से आने वाले भक्त जंगल में रात बिताते थे और सुबह मुरी भिगोकर प्रसाद स्वरूप ग्रहण कर लौट जाते थे। समय के साथ यही परंपरा एक भव्य लोक उत्सव में बदल गई।
स्थानीय लोगों का मानना है कि एक साथ मुरी खाने से संजीवनी शक्ति बढ़ती है, जिससे तन और मन दोनों में ऊर्जा का संचार होता है।
आज भी केंजाकुड़ा का मुरी मेला बांकुड़ा की लोक-संस्कृति, सामूहिकता और परंपरा का जीवंत उदाहरण बना हुआ है,जहाँ साधारण मुरी बन जाती है असाधारण उत्सव का केंद्र।
बांकुड़ा में सदियों पुराना ‘मुरी मेला’: आस्था, परंपरा और स्वाद का अद्भुत संगम
Reviewed by Bengal Media
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January 18, 2026
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